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काम, जिम्मेदारियाँ और संघर्ष: घरेलू कामगार महिलाओं से मुलाकात

By May 26, 2026No Comments

पिछले कुछ वर्षों में YUVA के साथ काम करते हुए मुझे अलग-अलग बस्तियों और इलाकों में घरेलू कामगार महिलाओं से मिलने और उनके साथ समय बिताने का मौका मिला। इन मुलाकातों में मैंने सिर्फ उनके काम के बारे में नहीं जाना, बल्कि उनके जीवन, जिम्मेदारियों, संघर्षों और उम्मीदों को भी करीब से समझने की कोशिश की।

हर दिन किसी और के घर को संभालने वाली ये महिलाएँ शहरों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे सफाई करती हैं, खाना बनाती हैं, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल करती हैं और कई तरह की जिम्मेदारियाँ उठाती हैं। लेकिन दूसरों के घरों को संभालते-संभालते, अक्सर उनके अपने संघर्ष पीछे छूट जाते हैं।

घरेलू कामगार महिलाओं से हुई बातचीत में एक बात बार-बार सामने आई, कई महिलाओं के लिए यह काम सिर्फ रोज़गार नहीं, बल्कि परिवार चलाने की मजबूरी भी है। कम वेतन, लंबे काम के घंटे, बढ़ती उम्र, असुरक्षित काम की परिस्थितियाँ और सामाजिक सुरक्षा की कमी जैसी चुनौतियाँ आज भी उनके जीवन का हिस्सा हैं।

“हमारी क्या पहचान है?” – महिलाओं के अनुभव और सवाल

अलग-अलग जिलों में महिलाओं से बातचीत के दौरान लगभग हर महिला ने अपने जीवन के किसी न किसी संघर्ष के बारे में बताया। कोई कई वर्षों से अलग-अलग घरों में काम कर रही थी, तो कोई परिवार की पूरी जिम्मेदारी अकेले संभाल रही थी। बातचीत के दौरान जब उनसे पूछा गया कि वे खुद को किस पहचान से देखती हैं, तो कई महिलाओं ने एक जैसी बात कही:

“हमारी क्या पहचान है? हम तो बस दूसरों के घरों में काम करने वाली महिलाएँ हैं।”

यह सिर्फ एक जवाब नहीं था। यह उन भावनाओं को समझने का एक पल था, जहाँ वर्षों तक काम करने के बावजूद कई महिलाओं को अपने काम की पहचान और सम्मान महसूस नहीं होता। कुछ परिवारों में दो पीढ़ियों से महिलाएँ घरेलू काम कर रही हैं। वहीं कई बुजुर्ग महिलाएँ 70 वर्ष की उम्र के बाद भी काम करने के लिए मजबूर हैं।

नागपुर की एक मुलाकात

नागपुर की एक बस्ती में घरेलू कामगार महिलाओं के साथ हमारी एक बैठक हुई थी। वहाँ लगभग 15–20 महिलाएँ मौजूद थीं। वे अपने काम के अनुभव साझा कर रही थीं,  कब से काम कर रही हैं, काम की जगह पर कैसा व्यवहार होता है, किन दिक्कतों का सामना करना पड़ता है और बढ़ती उम्र के साथ काम करना कितना मुश्किल हो जाता है।

इसी बातचीत के दौरान लगभग 72 वर्ष की एक बुजुर्ग महिला बैठक में आईं। उनके चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी। चलते समय उनके हाथ-पैर काँप रहे थे। उन्होंने बताया कि वे पिछले 50 वर्षों से घरेलू काम कर रही हैं।

उन्होंने कहा कि अब उनके परिवार में उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। बच्चों की शादी हो चुकी है और पति के निधन के बाद वे अकेली रह गई हैं। बढ़ती उम्र और कमजोर शरीर के बावजूद वे छोटे-मोटे घरों का काम करती हैं ताकि दो वक्त का खाना मिल सके।

बात करते-करते उन्होंने हमसे पूछा:

“अब मुझसे पहले जैसा काम नहीं होता। हाथ-पैर भी साथ नहीं देते। कई लोग उम्र की वजह से काम भी नहीं देते। ऐसे में मैं क्या करूँ?”

उस समय उनके सवालों का आसान जवाब हमारे पास नहीं था। लेकिन उनकी बातों ने यह जरूर सोचने पर मजबूर किया कि लंबे समय तक काम करने के बाद भी कई घरेलू कामगार महिलाएँ आज असुरक्षा और अकेलेपन के साथ जीवन जी रही हैं।

घरेलू काम और असुरक्षा की वास्तविकता

इन मुलाकातों के दौरान यह भी समझ में आया कि घरेलू कामगारों की ज़िंदगी में असुरक्षा कितनी गहराई से जुड़ी हुई है। घरेलू कामगारों को असंगठित कामगारों में गिना जाता है। यानी ऐसे कामगार, जिन तक श्रम अधिकारों, सामाजिक सुरक्षा और सरकारी योजनाओं की पहुँच अक्सर सीमित रह जाती है।

कई महिलाओं ने बताया कि उनके पास नियमित आय नहीं होती। कई जगहों पर वे बिना छुट्टी, बिना तय समय और बिना किसी सुरक्षा के काम करती हैं। अगर वे बीमार पड़ जाएँ या उम्र की वजह से काम न कर पाएँ, तो उनके सामने आय का संकट खड़ा हो जाता है।

बढ़ती उम्र के साथ यह चिंता और गहरी हो जाती है। कई महिलाओं ने बताया कि वे तब तक काम करना चाहती हैं जब तक शरीर साथ दे, क्योंकि उनके पास किसी तरह की बचत या सहारा नहीं है।

अधिकारों की बात क्यों ज़रूरी है?

घरेलू कामगार महिलाओं से हुई बातचीत में यह बात लगातार सामने आई कि उनके काम को आज भी कई जगहों पर “काम” की तरह पूरी तरह नहीं देखा जाता। वे रोज़ घंटों मेहनत करती हैं, कई घरों की जिम्मेदारियाँ संभालती हैं, लेकिन फिर भी उनके काम को वह पहचान, सुरक्षा और सम्मान नहीं मिल पाता, जिसकी वे हकदार हैं।

इसी वजह से आज दुनिया भर में घरेलू कामगारों के अधिकारों को लेकर बात की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) का कन्वेंशन 189 भी इसी बात को मान्यता देता है कि घरेलू कामगारों को अन्य श्रमिकों की तरह सम्मानजनक काम की परिस्थितियाँ, उचित वेतन, तय कार्य घंटे और सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए। यह कन्वेंशन घरेलू कामगारों के काम की विशेष परिस्थितियों को भी समझता है, क्योंकि उनका कार्यस्थल किसी का निजी घर होता है। इसलिए उनके लिए सुरक्षित और गरिमापूर्ण कार्य वातावरण सुनिश्चित करना भी ज़रूरी माना गया है।

भारत में भी घरेलू कामगारों के अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। हालांकि, अभी भी घरेलू कामगारों की कुल संख्या को लेकर स्पष्ट और नई जानकारी वाले आँकड़ों की कमी है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSSO 2011–12) के अनुसार, देश में लगभग 39 लाख लोग घरेलू कामगार के रूप में कार्यरत थे, जिनमें लगभग 26 लाख महिलाएँ थीं।

महिलाओं के अनुभवों से यह भी समझ में आया कि अगर वे बीमार पड़ जाएँ, काम छूट जाए या बढ़ती उम्र की वजह से काम न कर पाएँ, तो उनके पास कोई सुरक्षा नहीं बचती। शायद यही कारण है कि घरेलू कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम वेतन और सुरक्षित काम की परिस्थितियों पर बात करना इतना ज़रूरी हो जाता है।

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की ओर से घरेलू कामगारों के लिए एक राष्ट्रीय नीति पर भी विचार किया जा रहा है, जो अभी शुरुआती चरण में है। इसमें घरेलू कामगारों को श्रम कानूनों के दायरे में लाने, सामाजिक सुरक्षा तक पहुँच बढ़ाने, न्यूनतम वेतन, यूनियन बनाने के अधिकार, कौशल विकास, शिकायत निवारण और शोषण से सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को शामिल करने की बात की गई है।

घरेलू कामगार महिलाओं से हुई मुलाकातों और बातचीत ने यह समझने का अवसर दिया कि घरेलू कामगारों के अधिकारों की बात केवल नीतियों की चर्चा नहीं है। यह उन लाखों महिलाओं के जीवन, सम्मान और सुरक्षा से जुड़ा सवाल है, जो हर दिन दूसरों के घर संभालते हुए अपने जीवन को भी संभालने की कोशिश करती हैं।

इन अनुभवों ने क्या सिखाया

घरेलू कामगार महिलाओं से हुई मुलाकातों और बातचीत ने यह समझने का अवसर दिया कि उनके जीवन को केवल “काम” के दायरे में नहीं देखा जा सकता। उनके पीछे परिवार की जिम्मेदारियाँ, आर्थिक दबाव, असुरक्षा और लगातार मेहनत की लंबी कहानी होती है।

फिर भी, इन सबके बीच कई महिलाओं में आगे बढ़ने की इच्छा, आत्मसम्मान और जीवन को संभालने की ताकत साफ दिखाई देती है। कई मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद वे हर दिन अपने परिवारों और जीवन को संभालने की कोशिश करती रहती हैं।

घरेलू कामगार हमारे समाज और शहरों की रोज़मर्रा की व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। शायद सबसे ज़रूरी बात यही है कि घरेलू कामगारों के अनुभवों को सुना जाए, उनके काम को गरिमा के साथ देखा जाए और उनके अधिकारों तथा सामाजिक सुरक्षा पर गंभीरता से बात की जाए। क्योंकि सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन हर कामगार का अधिकार है।